Friday, 27 December 2013

मन की बेड़ियाँ


आऊंगा में भी निकलकर,
तोड़कर इन काले पत्थरों को,
फाड़कर सीना काले पहाड़ का,
नदियों में पत्थर तैराकर,
इस अँधेरे जंगले से निकलकर,

वो एक किरण सूरज की,
जो दिख रही है मुझे,
वही मेरा मार्गदशन करेगी,
यही बनेगी निमित मेरी,
कामयाबी की,

इस अँधेरी वीरान जगह पर,
हुआ बहुत समय अब,
पहचान गया हूँ में,
सब समझ गया हूँ में अब,

जिन बेड़ियों को में अपने,
पैरों में बंधा महसूस करता था,
हाथों में जिनका बोझ लगा करता था,

वास्तव में तो वो,
सिर्फ मिथ्या थी,
वो बेड़ियाँ लोहे पत्थर की नहीं,
मेरे विचारों से बनी है,

खुले हैं हाथ पाँव मेरे,
हर बंधन से में मुक्त हूँ,
चलता फिरता स्वस्थ हूँ,
एक दम दुरुस्त हूँ,

अब मन ही दिखाएगा,
रास्ता मुझे उजाले का,
जो कभी खुद में ही उलझकर,
ले आया था मझे इस अँधेरे में,

अब महसूस करता हूँ में,
हर मुकाम मेरी मुट्ठी में हैं,
विश्वास खुदपर सौ गुना है,
सीधी सरल है जिंदगी,
नहीं उलझी किसी गुत्थी में है .

Wednesday, 2 October 2013

लाल बहादुर शाश्त्री जी के जन्मदिन पर मेरी उनको कविता के रूप में श्रधांजलि

जो ज्ञानी है वो तोलेगा
सोच समझ के बोलेगा
दुनिया लाख उल्हाना दे
बस सच्चाई के पट खोलेगा 



भारत माँ के लाल थे
बहादुरी की मिसाल थे
पारंगत थे वो ज्ञानी थे 
ऐसे लाल बहादुर शास्त्री थे

छोटा कद था पद बड़ा 
जिम्मेदारी का भार पड़ा 
कमजोर कड़ी है, बोलते थे
हलके में सब तोलते थे


अम्बार भरा था भोजन का 
पर खाली थे बर्तन सारे
जब देश के बच्चे भूके हैं 
तो कैसे खाए बच्चे मेरे 



एक बखत का खाना छोड़ो 
तो कल भरपेट खायेंगे
खेतों की तो बात अलग है 
हर इंच में हल चलायेंगे 

लाँघ पडोसी सीमो को
कर बैठा फिर गुस्ताखी था
फिर जोर से गरजे शास्त्री जी   
बस लाहौर ही था जो बाकी था




जय जवान और जय इसान 
शास्त्री जी का नारा था 
यहाँ सोने से लहराई धरती 
वहां नीच पडोसी हारा था 

फिर इसी महानायक को 
सबने शत शत नमन किया
जिसे कहते थे कमजोर कड़ी
उसका ही वंदन किया




इति०
मधुर त्यागी  

Saturday, 28 September 2013

भगत की जरुरत 

ए भगत तेरी फिर,
जरुरत है हिन्दुस्तां  को,
फिर से यहाँ वही,
दौर वापस आ रहा है।

जिस हिन्द की खातिर,
चढ़ा सूली पे तू हंस कर, 
उसी हिन्द में अब काला, 
साम्राज्यवाद आ रहा है।

हमारा बन फिर सरपरस्त, 
फिर जला अलख देश प्रेम की, 
धमाकों से फिर बहरों को,
जगाने का वक़्त आ रहा है।

धूर्त के पंजों में,
कैद है फिर तेरी भारत माँ ,
फिर से गुलामी का,
रिवाज़ आ रहा है। 

मजहबी हिंसा से आज़ादी, 
छिनती दिख रही भगत,
धरती माँ की कोख से, 
देख खून बह रहा है। 

फिर चाहिए सान तेरी,
फिर विचारों को धार चाहिए, 
इस बिगड़ते हालात को,
तेरी सोच का आकार चाहिए।

आ भगत अब लौट आ,
फिर से तेरी जरुरत है,
वक़्त इन्कलाब का,
फिर से आ रहा है।।

इति ०

मधुर त्यागी 

Sunday, 8 September 2013


खूब सजे पंडाल यहाँ 

हर गली गलियारों में

बैठे हैं मंगलमूर्ति 

आस्था के पंडालो में।।


गणपति बाप्पा मोरया 

हर बच्चा बूढा बोल रहा

ढोल मृदंग की ताल पे

मस्ती के पट खोल रहा।।


बाप्पा तेरी पूजा में 

कैसे मन को लगाऊँ में 

कैसे तेरी महिमा में 

अपना शीश नवाऊँ में।।

जब कट रहे हैं शीश वहां 

आपस में भाई भाई के

किस मुंह से बाप्पा तेरा 

मीठा मोदक खाऊं में।।


इधर गिर रहा है रुपया  

दिन और रात में  

उधर लाँघ रहा है पडोसी 

सीमा साथ साथ में 

इधर खून की होली खेल रही है 

सडकों पर टोली समाज की 

पढ़ लिख कर भी रह गयी 

गंवार जनता आज ही 



गंभीर है स्थिति 
कुछ तो सोचना होगा
इन वोटों के भिखमंगो को,
जनता को भड़काने से रोकना 

होगा,
भड़क उठी जो चिंगारी
फिर से मज़हब के नाम पर
अल्लाह कहो या राम
किसी के नाम पर तो रोकना होगा




Friday, 6 September 2013

बहुत ही नन्ही सी थी वो,
पर हौसला उसमें दुनिया भर का,
नन्हे नन्हे पंख फेहराये,
हवा में गोते लगाते,
देखा मैंने उसको
अरावली की गोदी में





हर चोटी से ऊपर ऊपर
कभी पंख हिलाती
कभी बहने देती खुदको
खुले आसमान में
हवा से लोहा लेती हुई
देखा मैंने उसको
अरावली की गोदी में
नन्ही सी थी
पर हौसला उसमें दुनिया भर का

उसने भी सोचा होता जो
क्या उड़ पाऊँगी इतना ऊपर
मस्तक ताने खड़ा पहाड़
उससे भी ऊपर ऊपर
मन में एक लगन थी बस
उड़ना है दूर गगन में
ठंडी ठंडी हवा की लहरें
बहती मदमस्त गगन में



ऊंचा ऊंचा उड़ते उड़ते
वोह कुछ पल को गायब हो गयी
"डर नहीं सिर्फ वहेम है"
शायद जाकर सहेलियों से बोली
और फिर कुछ ही पल में
वहां आई चिडियों की टोली
मदमस्त हवा के आँचल में
फिर मस्त हुई उनकी टोली
और उस चिड़िया को फिर मैंने
देखा और भी ऊंचा उड़ते हुए
नयी ऊंचाई छूते हुए
नए हौसले से भरे हुए

अब शाम ढली सूरज डूबा
कल नया सवेरा आएगा
कल इस चिड़िया का हौसला
कुछ और बुलंद हो जायेगा।







 

Tuesday, 27 August 2013

संभालो दोस्तों


यूँही जो चलते रहे जो भेड चाल ,

तो इस बार फिर ,

फूँक लोगे घर अपना ही ,


इसमें तुम्हारे अपने रहते हैं ,


इसे संभालो दोस्तों ,


अपने ज़ज्बात संभालो दोस्तों,


वो कैसे मिट सकता है ,

जिसे खुद खुदा ने बनाया है ,


हमें मजहब ने नहीं,

मजहब हमने बनाया है,

चंद लोगो की बातों को ,

दिल से न लगाओ दोस्तों ,

यह घर अपना है ,

अपने ही हाथो न जलाओ इसे दोस्तों।



फिर से हो रही है सियासत ,

पुराने ही मसलो पे ,

अभी धुला नहीं है रंग खून का ,

उन्ही पुरानी सडको से ,

फिर से तलवार धनुष मत उठाओ दोस्तों ,

कुछ तो इंसानियत बचाओ दोस्तों ,

यें तुम्हारे ही घर हैं ,

इन्हें अपने ही हाथों ,

मत जलाओ दोस्तों।

Sunday, 14 July 2013

ख्वाब भरा आईना

ख्वाब भरा आईना  है
मेरे कमरे में
जब भी आते जाते
नजरें आईने पर पड जाती है
तो झिलमिल झिलमिल कर
सैंकड़ो ख्वाबों का
ताँता सा लग जाता है

इस आईने में
दौलत, शोहरत, नाम
दुनिया भर के ऐश-ओ-आराम
ऐसे सपने मेरे आते ही
आमने सामने घूमने लगते हैं

दुनिया में  नाम कमाने का सपना
कुछ कर गुज़र जाने का सपना
सितारों के मानिंद चमकने का सपना
सागर की गहरायी में उतरने का सपना

घर से बहार निकलने से पहले
रोज एक सपना चुनकर
अपने थैले में डाल लेता हूँ
कुछ कभी पूरे हो जाते हैं
और कुछ को सही वक़्त आने तक
इसी आईने में संजों कर रखता हूँ

पर यह ख्वाब वाला आईना
है जबरदस्त
यह हर दम मेरी उम्मीद
खुदसे बांधे रखता है
में कभी जब हारा महसूस करता हूँ
तो इसके सामने जाकर खड़ा हो जाता हूँ
और फिर ख्वाब अपना कमाल
दिखाना शुरू कर देते हैं

इसीलिए कमाल का आईना है मेरे कमरे में
खवाब भरा आईना है मेरे कमरे में

© मधुर त्यागी
14 JULY 2013

madhur tyagi

Friday, 26 April 2013