यूँही जो चलते रहे जो भेड चाल ,
तो इस बार फिर ,
फूँक लोगे घर अपना ही ,
इसमें तुम्हारे अपने रहते हैं ,
इसे संभालो दोस्तों ,
अपने ज़ज्बात संभालो दोस्तों,
वो कैसे मिट सकता है ,
जिसे खुद खुदा ने बनाया है ,
हमें मजहब ने नहीं,
मजहब हमने बनाया है,
चंद लोगो की बातों को ,
दिल से न लगाओ दोस्तों ,
यह घर अपना है ,
अपने ही हाथो न जलाओ इसे दोस्तों।
फिर से हो रही है सियासत ,
पुराने ही मसलो पे ,
अभी धुला नहीं है रंग खून का ,
उन्ही पुरानी सडको से ,
फिर से तलवार धनुष मत उठाओ दोस्तों ,
कुछ तो इंसानियत बचाओ दोस्तों ,
यें तुम्हारे ही घर हैं ,
इन्हें अपने ही हाथों ,
मत जलाओ दोस्तों।