Friday, 27 December 2013

मन की बेड़ियाँ


आऊंगा में भी निकलकर,
तोड़कर इन काले पत्थरों को,
फाड़कर सीना काले पहाड़ का,
नदियों में पत्थर तैराकर,
इस अँधेरे जंगले से निकलकर,

वो एक किरण सूरज की,
जो दिख रही है मुझे,
वही मेरा मार्गदशन करेगी,
यही बनेगी निमित मेरी,
कामयाबी की,

इस अँधेरी वीरान जगह पर,
हुआ बहुत समय अब,
पहचान गया हूँ में,
सब समझ गया हूँ में अब,

जिन बेड़ियों को में अपने,
पैरों में बंधा महसूस करता था,
हाथों में जिनका बोझ लगा करता था,

वास्तव में तो वो,
सिर्फ मिथ्या थी,
वो बेड़ियाँ लोहे पत्थर की नहीं,
मेरे विचारों से बनी है,

खुले हैं हाथ पाँव मेरे,
हर बंधन से में मुक्त हूँ,
चलता फिरता स्वस्थ हूँ,
एक दम दुरुस्त हूँ,

अब मन ही दिखाएगा,
रास्ता मुझे उजाले का,
जो कभी खुद में ही उलझकर,
ले आया था मझे इस अँधेरे में,

अब महसूस करता हूँ में,
हर मुकाम मेरी मुट्ठी में हैं,
विश्वास खुदपर सौ गुना है,
सीधी सरल है जिंदगी,
नहीं उलझी किसी गुत्थी में है .