Friday, 6 September 2013

बहुत ही नन्ही सी थी वो,
पर हौसला उसमें दुनिया भर का,
नन्हे नन्हे पंख फेहराये,
हवा में गोते लगाते,
देखा मैंने उसको
अरावली की गोदी में





हर चोटी से ऊपर ऊपर
कभी पंख हिलाती
कभी बहने देती खुदको
खुले आसमान में
हवा से लोहा लेती हुई
देखा मैंने उसको
अरावली की गोदी में
नन्ही सी थी
पर हौसला उसमें दुनिया भर का

उसने भी सोचा होता जो
क्या उड़ पाऊँगी इतना ऊपर
मस्तक ताने खड़ा पहाड़
उससे भी ऊपर ऊपर
मन में एक लगन थी बस
उड़ना है दूर गगन में
ठंडी ठंडी हवा की लहरें
बहती मदमस्त गगन में



ऊंचा ऊंचा उड़ते उड़ते
वोह कुछ पल को गायब हो गयी
"डर नहीं सिर्फ वहेम है"
शायद जाकर सहेलियों से बोली
और फिर कुछ ही पल में
वहां आई चिडियों की टोली
मदमस्त हवा के आँचल में
फिर मस्त हुई उनकी टोली
और उस चिड़िया को फिर मैंने
देखा और भी ऊंचा उड़ते हुए
नयी ऊंचाई छूते हुए
नए हौसले से भरे हुए

अब शाम ढली सूरज डूबा
कल नया सवेरा आएगा
कल इस चिड़िया का हौसला
कुछ और बुलंद हो जायेगा।







 

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