Sunday, 4 July 2010

हजारों मील दूर हूँ अपने घर से ,

पर छोटी सी बात एक पल में वहां पहुंचा देती है ,

इस अनजाने से शहर में ,

घर की याद दिला देती है ,


दिन बीत जाता है धीरे धीरे ,

फिर शाम आती है ,

माँ के हाथ की बनी चाय ,

उस वक़्त याद बहुत आती है ,


जब होटल में खाना खता हूँ ,

मोटे मोटे रोट चबाता हूँ ,

माँ के फुल्कोको याद कर ,

सारा भोजन चाट कर जाता हूँ ,


कभी अपनी बिल्डिंग की खिड़की से ,

ढूंडा करता हूँ चाँद यहाँ ,

तारे गिन गिन सो जाता था,

घर की छत पर में अपनी वहां,


कभी आंखें भर आती हैं तो ,

घर पर बातें कर लेता हूँ ,

करने क्या आया में काम यहाँ ,

वो सोच धेर्य धर लेता हूँ ,


अपनी पहचान बनाने आया हूँ ,

कुछ नया समझने आया हूँ ,

में भी कुछ हूँ ,

इस दुनिया को में यह बतलाने आया हूँ ,


मधुर त्यागी