हजारों मील दूर हूँ अपने घर से ,
पर छोटी सी बात एक पल में वहां पहुंचा देती है ,
इस अनजाने से शहर में ,
घर की याद दिला देती है ,
फिर शाम आती है ,
माँ के हाथ की बनी चाय ,
उस वक़्त याद बहुत आती है ,
मोटे मोटे रोट चबाता हूँ ,
माँ के फुल्कोको याद कर ,
सारा भोजन चाट कर जाता हूँ ,
तारे गिन गिन सो जाता था,
घर की छत पर में अपनी वहां,
घर पर बातें कर लेता हूँ ,
करने क्या आया में काम यहाँ ,
वो सोच धेर्य धर लेता हूँ ,
कुछ नया समझने आया हूँ ,
में भी कुछ हूँ ,
इस दुनिया को में यह बतलाने आया हूँ ,
मधुर त्यागी