सवाल
किन्ही अनचाहे रास्तों से,
गुजरता में नंगे पाओं,
महसूस करता हूँ ,
सूरज की एक एक तपती किरन,
रस्ते का इक इक कंकड़ ,
जो कभी चुभता तो ,
कभी आराम देता है ,
कभी धुल का गुबार ,
मेरी सांसों को परखने के लिए,
उमड़ उमड़ कर मेरी और आता है,
और महसूस देती है ,
पानी की इक बूंद की चाह,
भूक से उठती ,
पेट की मरोड़,
सीने में धड़कती ,
इक इक धड़कन का हिसाब,
उसपर इक आताह अकेलापन,
और कभी न ख़त्म होने वाला मंजर ,
और तब में खुद से पूछता हूँ ,
क्या अब भी कोई उम्मीद बाकी है?


