Saturday, 28 September 2013

भगत की जरुरत 

ए भगत तेरी फिर,
जरुरत है हिन्दुस्तां  को,
फिर से यहाँ वही,
दौर वापस आ रहा है।

जिस हिन्द की खातिर,
चढ़ा सूली पे तू हंस कर, 
उसी हिन्द में अब काला, 
साम्राज्यवाद आ रहा है।

हमारा बन फिर सरपरस्त, 
फिर जला अलख देश प्रेम की, 
धमाकों से फिर बहरों को,
जगाने का वक़्त आ रहा है।

धूर्त के पंजों में,
कैद है फिर तेरी भारत माँ ,
फिर से गुलामी का,
रिवाज़ आ रहा है। 

मजहबी हिंसा से आज़ादी, 
छिनती दिख रही भगत,
धरती माँ की कोख से, 
देख खून बह रहा है। 

फिर चाहिए सान तेरी,
फिर विचारों को धार चाहिए, 
इस बिगड़ते हालात को,
तेरी सोच का आकार चाहिए।

आ भगत अब लौट आ,
फिर से तेरी जरुरत है,
वक़्त इन्कलाब का,
फिर से आ रहा है।।

इति ०

मधुर त्यागी 

Sunday, 8 September 2013


खूब सजे पंडाल यहाँ 

हर गली गलियारों में

बैठे हैं मंगलमूर्ति 

आस्था के पंडालो में।।


गणपति बाप्पा मोरया 

हर बच्चा बूढा बोल रहा

ढोल मृदंग की ताल पे

मस्ती के पट खोल रहा।।


बाप्पा तेरी पूजा में 

कैसे मन को लगाऊँ में 

कैसे तेरी महिमा में 

अपना शीश नवाऊँ में।।

जब कट रहे हैं शीश वहां 

आपस में भाई भाई के

किस मुंह से बाप्पा तेरा 

मीठा मोदक खाऊं में।।


इधर गिर रहा है रुपया  

दिन और रात में  

उधर लाँघ रहा है पडोसी 

सीमा साथ साथ में 

इधर खून की होली खेल रही है 

सडकों पर टोली समाज की 

पढ़ लिख कर भी रह गयी 

गंवार जनता आज ही 



गंभीर है स्थिति 
कुछ तो सोचना होगा
इन वोटों के भिखमंगो को,
जनता को भड़काने से रोकना 

होगा,
भड़क उठी जो चिंगारी
फिर से मज़हब के नाम पर
अल्लाह कहो या राम
किसी के नाम पर तो रोकना होगा




Friday, 6 September 2013

बहुत ही नन्ही सी थी वो,
पर हौसला उसमें दुनिया भर का,
नन्हे नन्हे पंख फेहराये,
हवा में गोते लगाते,
देखा मैंने उसको
अरावली की गोदी में





हर चोटी से ऊपर ऊपर
कभी पंख हिलाती
कभी बहने देती खुदको
खुले आसमान में
हवा से लोहा लेती हुई
देखा मैंने उसको
अरावली की गोदी में
नन्ही सी थी
पर हौसला उसमें दुनिया भर का

उसने भी सोचा होता जो
क्या उड़ पाऊँगी इतना ऊपर
मस्तक ताने खड़ा पहाड़
उससे भी ऊपर ऊपर
मन में एक लगन थी बस
उड़ना है दूर गगन में
ठंडी ठंडी हवा की लहरें
बहती मदमस्त गगन में



ऊंचा ऊंचा उड़ते उड़ते
वोह कुछ पल को गायब हो गयी
"डर नहीं सिर्फ वहेम है"
शायद जाकर सहेलियों से बोली
और फिर कुछ ही पल में
वहां आई चिडियों की टोली
मदमस्त हवा के आँचल में
फिर मस्त हुई उनकी टोली
और उस चिड़िया को फिर मैंने
देखा और भी ऊंचा उड़ते हुए
नयी ऊंचाई छूते हुए
नए हौसले से भरे हुए

अब शाम ढली सूरज डूबा
कल नया सवेरा आएगा
कल इस चिड़िया का हौसला
कुछ और बुलंद हो जायेगा।