Saturday, 28 September 2013

भगत की जरुरत 

ए भगत तेरी फिर,
जरुरत है हिन्दुस्तां  को,
फिर से यहाँ वही,
दौर वापस आ रहा है।

जिस हिन्द की खातिर,
चढ़ा सूली पे तू हंस कर, 
उसी हिन्द में अब काला, 
साम्राज्यवाद आ रहा है।

हमारा बन फिर सरपरस्त, 
फिर जला अलख देश प्रेम की, 
धमाकों से फिर बहरों को,
जगाने का वक़्त आ रहा है।

धूर्त के पंजों में,
कैद है फिर तेरी भारत माँ ,
फिर से गुलामी का,
रिवाज़ आ रहा है। 

मजहबी हिंसा से आज़ादी, 
छिनती दिख रही भगत,
धरती माँ की कोख से, 
देख खून बह रहा है। 

फिर चाहिए सान तेरी,
फिर विचारों को धार चाहिए, 
इस बिगड़ते हालात को,
तेरी सोच का आकार चाहिए।

आ भगत अब लौट आ,
फिर से तेरी जरुरत है,
वक़्त इन्कलाब का,
फिर से आ रहा है।।

इति ०

मधुर त्यागी 

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