Wednesday, 12 March 2014

"में अकेला पहाड़ तोड़ सकता हूँ"





मेरी इस कविता के प्रेरणा श्रोत बिहार के गहलौर गाव के दशरथ मांझी जी हैं। जो एक लक्षय मन में रखकर 

दिन रात लगातार २२ साल तक पहाड़ के एक एक पत्थर को तोड़ते रहे ताकि वो एक दिन उसमें से रास्ता 

निकाल सकें। उस वक़्त आते जाते हर आदमी ने इनके बारे में बहुत कुछ बुरा भला कहा होगा मगर उसकी 

परवाह न करते हुए लक्षय पर अडिग रहे और एक दिन सच में पहाड़ का सीना फाड़ दिया। ऐसी लगन अगर 

हम सब में अपने लक्षय के प्रति हो तो हमारा कोई भी मुसीबत रास्ता नहीं रोक सकती।    




टूट जाता है जिसका हौसला बीच राह में,

खुद ही अपना विश्वास वो मिलाता है खाख में,

वो ही बोलता है कि "मैं अकेला क्या कर सकता हूँ ?"

कोई साथ तो दो "मैं अकेला कहाँ पहाड़ तोड़ सकता हूँ ?"



नहीं चाहिए हाथ किसी का,

जिसे खुद पर यकीन हो ,

एक दृढ लक्ष्य हो,

और सर पर जुनून हो,



एक बार में उसको भी,

सफलता मिलती नहीं,

पर उसके विश्वास के आगे,

असफलता टिकती नहीं,



वो छोड़ता नहीं डोर आशा की बीच राह में,

रोकता नहीं काम अपना किसी के इन्तजार में,

सुनता नहीं किसी कि बस जानता है कि "मैं कर सकता हूँ"

"मैं अकेला भी पहाड़ तोड़ सकता हूँ"



मधुर