Sunday, 4 July 2010

हजारों मील दूर हूँ अपने घर से ,

पर छोटी सी बात एक पल में वहां पहुंचा देती है ,

इस अनजाने से शहर में ,

घर की याद दिला देती है ,


दिन बीत जाता है धीरे धीरे ,

फिर शाम आती है ,

माँ के हाथ की बनी चाय ,

उस वक़्त याद बहुत आती है ,


जब होटल में खाना खता हूँ ,

मोटे मोटे रोट चबाता हूँ ,

माँ के फुल्कोको याद कर ,

सारा भोजन चाट कर जाता हूँ ,


कभी अपनी बिल्डिंग की खिड़की से ,

ढूंडा करता हूँ चाँद यहाँ ,

तारे गिन गिन सो जाता था,

घर की छत पर में अपनी वहां,


कभी आंखें भर आती हैं तो ,

घर पर बातें कर लेता हूँ ,

करने क्या आया में काम यहाँ ,

वो सोच धेर्य धर लेता हूँ ,


अपनी पहचान बनाने आया हूँ ,

कुछ नया समझने आया हूँ ,

में भी कुछ हूँ ,

इस दुनिया को में यह बतलाने आया हूँ ,


मधुर त्यागी

6 comments:

  1. mere bhai..bahut hi dil se likha hai..jo bhi likha hai...bas padh ke aise hi laga....

    I am alrdy in love with it...good:)

    keep on writing....

    ReplyDelete
  2. keep on ur writing....best of luck...u may inspire a lot of ppl to love there country....

    ReplyDelete
  3. Madhur Tyagi, tum bahut khub likhte hi nahi apitu ek bahut achhe insan bhi ho. Tumhari abhivakti hirday ko chhuti he. Bahut hi apane se lagate ho

    ReplyDelete
  4. मौसा जी धन्यवाद

    ReplyDelete