Saturday, 1 October 2011

           सवाल 


किन्ही अनचाहे रास्तों से,
गुजरता में नंगे पाओं,
महसूस करता हूँ ,
सूरज  की एक एक तपती किरन,
रस्ते का इक इक कंकड़ ,
जो कभी चुभता तो ,
कभी आराम देता है ,
कभी धुल का गुबार , 
मेरी सांसों को परखने के  लिए,
उमड़ उमड़ कर मेरी और आता है,
और  महसूस देती है ,
सूखते गले को ,
पानी की इक बूंद की चाह,
भूक से उठती ,
पेट की मरोड़,
सीने में धड़कती ,
इक इक धड़कन का हिसाब, 
उसपर इक आताह अकेलापन,
और कभी न ख़त्म होने वाला मंजर ,
और तब में खुद से  पूछता हूँ ,
क्या अब भी कोई उम्मीद बाकी है?

1 comment:

  1. तुम्हारी लेखनी में उत्साह है ,धार है और तुम्हारे इरादों में मजबूती

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