Thursday, 23 September 2010

doshi kaun?

गुनाह तुम करते हो,
दोष देश को देते हो,
आग तुम लगाते हो,
दोष मज़हब को देते हो,
जब वक़्त है हाथों में लेकर
हाथ चलने का,
तब शांति को छोड़कर,
दहशत को चुनते हो,
तुम वो खून हो जो दौड़ता ,
हिन्दोस्तां की नब्ज में,
क्यों खून को निचोड़,
इसमें जहर भरते हो,
ऐसा हो कहीं आपस में,
तुम लड़- कट के मर जाओ,
भारत के तकदीर में ,
अँधेरे को लिख जाओ
अभी भी वक़्त है संभलने का,
भारत तुम से कहता है,
उठो ज़रा नजर डालो,
पडोसी ताक में बैठा है

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